चित्र: AI जनरेटेड, केवल चित्रण के उद्देश्य से
मेजर हर्षवर्धन बहुगुणा और मेजर जयवर्धन बहुगुणा
मेजर हर्षवर्धन बहुगुणा और उनके छोटे भाई मेजर जयवर्धन बहुगुणा केवल एवरेस्ट चढ़ाई करने वाले आम पर्वतारोही नहीं थे। वे न केवल भारतीय सेना के अधिकारी थे, बल्कि कुशल पर्वतारोही भी थे, जिनके नाम कई सफल अभियानों का श्रेय था। लेकिन जो बात उन्हें दूसरों से अलग करती है, वह यह है कि दोनों भाई अपनी दूसरी एवरेस्ट चढ़ाई के प्रयास में, लगभग एक ही स्थान पर (साउथ कोल रूट) शहीद हुए, और इन दोनों घटनाओं के बीच केवल 14 वर्षों का अंतर था। यह एक अद्भुत संयोग और साहस की वह कहानी है, जो आज भुला दी गई है।
मेजर हर्षवर्धन बहुगुणा: पहला प्रयास और अंतिम बलिदान
मेजर हर्षवर्धन बहुगुणा, जिन्हें प्यार से “बोगी” कहा जाता था, 1958 में भारतीय सेना के आर्मर्ड कॉर्प्स में कमीशन प्राप्त कर चुके थे। वे प्रतिष्ठित हाई एल्टीट्यूड वॉरफेयर स्कूल (HAWS), गुलमर्ग में प्रशिक्षक भी रह चुके थे। 1965 में भारतीय एवरेस्ट अभियान का हिस्सा होने के बावजूद, वे स्वास्थ्य समस्याओं के कारण शिखर से 400 फीट पहले रुकने को मजबूर हो गए।
अपने सपने को साकार करने की जिद ने उन्हें 1971 में अंतरराष्ट्रीय एवरेस्ट अभियान में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित किया। हालांकि, इस बार उनकी यह चढ़ाई उनके लिए अंतिम साबित हुई। 18 अप्रैल, 1971 को साउथ कोल के पास गंभीर मौसम और अकेलेपन के चलते वे शहीद हो गए।
मेजर जयवर्धन बहुगुणा: भाई के पदचिह्नों पर चलने का साहस
मेजर जयवर्धन बहुगुणा ने अपने भाई की प्रेरणा से पर्वतारोहण को अपनाया। 1984 में उन्होंने अपना पहला एवरेस्ट अभियान किया, जिसमें बछेंद्री पाल पहली भारतीय महिला बनीं, जिन्होंने एवरेस्ट पर चढ़ाई की। मेजर जय और मेजर किरण इंदर कुमार ने अद्भुत खेल भावना दिखाते हुए अपना ऑक्सीजन बछेंद्री पाल को दिया, ताकि वह शिखर पर पहुंच सकें।
1985 में, उन्होंने दूसरी बार एवरेस्ट चढ़ाई का प्रयास किया। यह अभियान भारतीय इतिहास का सबसे भयानक एवरेस्ट अभियान साबित हुआ, जिसमें पांच भारतीय अधिकारियों की जान गई। मेजर जयवर्धन बहुगुणा ने 10 अक्टूबर, 1985 को साउथ कोल के पास अत्यधिक ठंड और खराब मौसम के कारण अपना जीवन गंवा दिया, ठीक उसी स्थान के पास जहां उनके बड़े भाई 14 साल पहले शहीद हुए थे।
भूलते हुए नाम और उनकी विरासत
आज, लोकप्रिय संस्कृति में इन दो वीर भाइयों का नाम लगभग भुला दिया गया है। हालांकि, पर्वतारोहण के क्षेत्र में वे साहस और दृढ़ संकल्प के प्रतीक के रूप में जाने जाते हैं। उनकी याद में नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग के ऑडिटोरियम का नाम उनके नाम पर रखा गया है। इसके अलावा, नोएडा में एक पेट्रोल पंप भी उनके नाम पर समर्पित है।
एक प्रेरणादायक कथा
मेजर हर्षवर्धन और जयवर्धन बहुगुणा की कहानी साहस, संकल्प और बलिदान की अमर गाथा है। उन्होंने न केवल एवरेस्ट चढ़ने का सपना देखा, बल्कि अपने जीवन का बलिदान देकर उसे अमर कर दिया।



